श्री कामदगिरि प्रदक्षिणा प्रमुख द्वार ट्रस्ट श्री
चित्रकूट धाम
ट्रस्ट लोकहित को दृष्टिगत रखते हुए विभिन्न सेवा प्रकल्पों के माध्यम से अपनी विभिन्न गतिविधियां संचालित करता है। जिनका विवरण निम्नवत है-
औषधालय के प्रेरक एवं संस्थापक महंत श्री पुरूषोत्तम दास जी महाराज (डॉ साहब) थे। उन्होंने रोगियों के निःशुल्क उपचार के लिए दिन-रविवार, दिनांक-16/04/1995 को श्री श्री 1008 श्री महंत प्रेम पुजारी दास स्मारक धर्मार्थ आयुर्वेदिक औषधालय की स्थापना की । जिसके माध्यम से तब से आजतक प्रतिदिन लगभग 50 से 60 रोगियों का निःशुल्क उपचार विभिन्न रोगों के लिए हो रहा है। जिसमें एक प्रमुख चिकित्सक एवं दो सहायक चिकित्सक सेवारत हैं।चित्रकूट के जंगलों में निर्गुंडी, हंसराज, हडज़ोड़, वन कोदरा, सहसमुरीआ, ब्राह्मी, अजान, चिनवा, कोंहारी, ढिमरबेल, वन कपास जैसे कई औषधीय पेड़-पौधे पाए जाते हैं. चित्रकूट के देवांगना जंगल में सफ़ेद मूसली, कंदमूल, सफ़ेद प्याज़, हल्दी, आमा हल्दी, काली मूसली जैसी कई जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं. देवांगना जंगल में यारशागुंबा (जिसे कीड़ा-जड़ी भी कहा जाता है) नाम की एक बहुत महंगी जड़ी-बूटी पाई जाती है. यह पहाड़ों की ऊंचाइयों पर पाई जाती है और बहुत मुश्किल से मिलती है. चित्रकूट के आर्युवेद के डॉक्टरों के मुताबिक, तुलसी को “अतुलनीय”, “प्रकृति की मां औषधि”, और “जड़ी-बूटियों की रानी” कहा जाता है. चित्रकूट में भारतीय प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र भी है, जहां कम दामों में दवाइयां मिलती हैं
चित्रकूट की इस सद्गुरु गौशाला में तक़रीबन 1400 गौवंश हैं, जिसमें अधिकांशतः वह हैं जिनके मालिकों ने उनको छोड़ दिया है. उनको यहाँ शरण देकर उनके पालन पोषण का काम किया जाता है. इतना ही नहीं यहाँ हर एक गौवंशों का डिजिटल आधार कार्ड बनाया जाता है. जिसमे गायों के जबड़े का फोटो लेकर उनका सभी डाटा सॉफ्टवेयर में फीड किया जाता है. जिसके बाद यहाँ एक क्लिक में गायों के जबड़े को स्कैन करके उनका पूरा डाटा देखा जा सकता है, इस डिजिटल आधार कार्ड में गायों का नाम, लम्बाई, चौड़ाई, वज़न, पूर्व में कौन कौन सी बीमारियां और कौन कौन सा इलाज दिया गया इत्यादि पूरा डाटा मौजूद हैइस आधार कार्ड के बन जाने से गौवंशों के खोने का भी ख़तरा नहीं होता, ऐसे में गौवंशों को डिजिटल आधार कार्ड इस डिजिटल गौशाला को हाईटेक गौशाला बनाता है. इतना ही नहीं गंगा आरती की तर्ज़ और उसी निश्चित समय पर प्रतिदिन गौ आरती भी होती है जिसमे गौ प्रतिमा की आरती के बाद गौवंशो की आरती भी की जाती है। जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर जानकीकुण्ड स्थित सदगुरु गौ सेवा केंद्र है. यहां मौजूदा स्थिति में तक़रीबन 1400 गाय हैं, जिसमें लगभग 1100 गौवंशों का डिजिटल आधार कार्ड बना हुआ है.
ट्रस्ट के द्वारा आश्रम में औसतन 20 विद्यार्थियों को भोजन वस्त्र आवास एवं शैक्षणिक व्यय प्रदान करके उन्हें समुचित शिक्षा का अवसर प्रदान किया गया है। छात्रों की संख्या विभिन्न वर्षों में उपर्युक्त संख्या से कम या अधिक होती रहती है। इसके अतिरिक्त विभिन्न राष्ट्रीय पर्वों के अवसर पर शिक्षा के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए छात्रों को पुरस्कार वितरण किये जाते हैं। क्योंकि ट्रस्ट का मानना है कि शिक्षित एवं संस्कारित छात्र ही एक स्वस्थ समाज की स्थापना कर सकते हैं।
अखंड आश्रम का ट्रस्ट वर्ष 1944 में बना था और भक्तों के दान से सभी संपत्तियां बनाई गई हैं। अखंड आश्रम का दावा शिवधाम आश्रम भी ट्रस्ट का हिस्सा है और स्वामी अखंडानंद जी महाराज ने करीब सवा सौ नींव रखी थी।वर्तमान युग में समाज की एक बहुत बड़ी विडम्बना है कि जो लोग इस समाज को एवं परिवार को मजबूती प्रदान करने के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन न्यौछावर कर देते हैं। वृध्दावस्था में शक्ति क्षीण होने के पश्चात उनको ही बोझ मान लिया जाता है। प्राय: ऐसे लोग दर -2 भटकने के लिए मजबूर हो जाते हैं। उन्हें या तो किसी वृध्दाश्रम में आश्रय लेना पड़ता है या फिर किसी तीर्थ में जाकर जैसे तैसे अपना गुजारा करना पड़ता है। ट्रस्ट ऐसे ही निराश्रित, दीन-हीन एवं लाचार व्यक्तियों को आश्रय उपलब्ध कराकर भोजन, वस्त्र एवं निःशुल्क चिकित्सा आदि निरंतर प्रदान कराता है। ताकि वे भी एक सम्मान एवं स्वाभिमान पूर्ण जीवन व्यतीत कर सकें।
पौराणिक कथाओं परम्पराओं एवं मान्यताओं के अनुसार सम्पूर्ण भारत वर्ष में चार स्थानों पर कुम्भ मेले का आयोजन बारह वर्षों के अन्तराल में होता है।यह उत्सव चार पवित्र नदियों के किनारे चार तीर्थ स्थानों के बीच घूमता है- हरिद्वार में गंगा नदी पर, उज्जैन में शिप्रा पर, नासिक में गोदावरी पर और प्रयाग (आधुनिकप्रयागराज ) में गंगा, जमुना और पौराणिक सरस्वती के संगम पर।" कुम्भ में मात्र श्रृध्दालु तीर्थ यात्री ही नहीं आते हैं बल्कि सनातन धर्म के विभिन्न सम्रदायों के आश्रम धारी संतों ,महंतों , श्री महन्तों ,मण्डलेश्वरों ,आचार्य महामंडलेश्वरों ,सम्प्रदायाचार्यों एवं मनीषी ,महापुरुषों के विशाल शिविर आने वाले श्रृध्दालु तीर्थ यात्रियों का स्वागत करते हैं जिसमें नित्य गंगा स्नान, भजन-पूजन एवं सत्संग आदि की व्यवस्था होती है । देश के लगभग समस्त प्रमुख धार्मिक संस्थान अपने -2 शिविर स्थापित करके जनसेवा के सहभागी बनते हैं। ट्रस्ट की ओर से भी प्रत्येक वर्ष माघ मास में एक विशाल शिविर की स्थापना करके दैनिक भजन-पूजन, विद्वान संतों के द्वारा सत्संग, दरिद्र नारायण की सेवा , अतिथि सेवा एवं अन्य प्रकार के सेवा प्रकल्प सम्पूर्ण मेला काल तक चलाये जाते हैं।
भारतीय संस्कृति आनन्द, उल्लास एवं जीवंतता की संस्कृति है। जिसमें अनेक पर्वों एवं उत्सवों को आयोजित करके प्राचीन परम्पराओं को संरक्षित ही नही किया जाता है बल्कि जीवन को सरस, सरल एवं आनंदमय बनाने का प्रयास भी किया जाता है। ट्रस्ट की ओर से भारतीय संस्कृति एवं धार्मिक परम्पराओं को सम्मानित करने के लिए अनेक पर्व एवं उत्सवों का समय -समय पर आयोजन किया जाता है। जिसका विस्तृत विवरण वेबसाइट के वार्षिक आयोजनों का विवरण शीर्षक के अंतर्गत उपलब्ध है।